इतिहास की गवाही हो या परिस्थितियों की सच्चाई,
शाही के निशान एवं विचारों की गहराई ||
हर कलम जानती है वह पीड़ वह कठिनाई,
जिसके मुकाम से हर एक पुस्तक है उभर कर आई ||
वह भी समय था जब कवि खोजने पर भी नहीं मिलते थे,
और जो थे भी वह अपनी रोज़ी रोटी भी नहीं बीन सकते थे ||
जाने कितने जतन कर एक कविता लिखते थे,
और उसे छपाने की ख़ातिर दर-दर भटकते थे ||
एक रायल्टी की खबर घर में त्यौहार ले आती थी,
और कवि सम्मेलन के न्योंते के इंतजार में ज़िंदगी कट जाती थी ||
जियें तो केवल लिखने के लिए और लिखने को जीवन समझ लिया,
वैसी कौम आज ढ़ूँढ़ने पर भी कहाँ ||
पर, हर बार की तरह यहाँ भी टेक्नालाजी बीच में आई,
और कवि-यों कि दुनिया में एक नया रेवोलूशन ले आई ||
अब आलम यह है कि लेखक हर छत के तले मिलते हैं,
जो अपनी काबिल्यत ब्लॉग पर हुए हिट्स से काउंट करते हैं ||
इनोवेशेन के नाम पर एक कविता में कई भाषाओं को एक्स्प्लोइट करते हैं,
एक्सपीरियंस की ख़ातिर हर लिखी चीज़ को पड़ते हैं ||
वक्त़ दूर नहीं जब कवि सम्मेलन कि जगह कवि मैराथन निकलेगी,
जिसकी एंट्री फ़ीस कम से कम १० कविता पर ईयर रहेगी ||
जब अपनी ही कविता को पढने का समय नहीं मिल पाएगा, तब कवि टाइम मैनेजमेंट के फंडे अपनायेगा,
मैनेजमेंट अपना जोर दिखाएगी और झट से एक सर्टिफिकेशन कंपनी खुल जाएगी ||
पोएटिक एक्सप्रेशन एंड लेंगुएज टेस्ट कि तैयारी में होंगे सब बे हाल,
तभी होगी अपनी सही टैलेंट से पहचान ||
कभी तो मिलेगा इस प्रोफेशन को भी इंसाफ,
बनेंगे यह भी पोपुलेरिटी कि दुनिया के नवाब ||
अब दूर नहीं वह पल जब मैनेजमेंट और टेक्नालाजी दोनों की इन पर पड़ेगी नज़र,
टिल देन एवरी काबिल राइटर विश यू गुड लक !!
An aggregation of thoughts and ideas for anyone who appreciates wild but sensible read.
Wednesday, February 24
Friday, February 19
आज फिर ...
आज फिर दिल में जगी एक छोटी सी आशा,
एक अनजाने मकसद को पूरा करने की अभिलाषा ||
धुँधली तस्वीरें हैं मगर सामने कुछ नहीं,
आँखें मूंद कर जो दिखता है वह खुली आँखों से नहीं ||
मंज़िल की तो खबर है, पर डगर का न कोई ठिकाना,
पता नहीं यह आज की कहानी है या सदियों का फ़साना ||
शायद एक नये सपने की तलाश में आज फिर दिन ढल गया,
और कल के उस सपने को पूरा करने का वक्त़ भी निकल गया ||
अब तो जाग मुसाफिर एक सदी और गुज़र गयी,
बंद आँखों से देखे हुए सपनों की तो मंज़िल भी भटक गयी ||
आज फिर ... आज फिर ...
यह कहानी किसी पुस्तिका मैं छपेगी,
और कल शायद इसकी एक परछाईं भी बनेगी ||
परन्तु यही है इस दौर के हर लेखक का निशाना,
हर जागते हुए इन्सान को बस एक बार है और जगाना ||
एक अनजाने मकसद को पूरा करने की अभिलाषा ||
धुँधली तस्वीरें हैं मगर सामने कुछ नहीं,
आँखें मूंद कर जो दिखता है वह खुली आँखों से नहीं ||
मंज़िल की तो खबर है, पर डगर का न कोई ठिकाना,
पता नहीं यह आज की कहानी है या सदियों का फ़साना ||
शायद एक नये सपने की तलाश में आज फिर दिन ढल गया,
और कल के उस सपने को पूरा करने का वक्त़ भी निकल गया ||
अब तो जाग मुसाफिर एक सदी और गुज़र गयी,
बंद आँखों से देखे हुए सपनों की तो मंज़िल भी भटक गयी ||
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यह कहानी किसी पुस्तिका मैं छपेगी,
और कल शायद इसकी एक परछाईं भी बनेगी ||
परन्तु यही है इस दौर के हर लेखक का निशाना,
हर जागते हुए इन्सान को बस एक बार है और जगाना ||
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लफ्ज़ की लफ्ज़ से गुफ्तगू इतराते हुए सर का ताज हूँ मैं, बनते हुए रिश्तों की बुनियाद हूँ मैं। ... जाने कितने ही ज़ख्मों का इलाज हूँ में , गौर...
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What is my latest style to deal with a problem: Kill or Conclude 😉
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