इतराते हुए सर का ताज हूँ मैं,
बनते हुए रिश्तों की बुनियाद हूँ मैं। ...
जाने कितने ही ज़ख्मों का इलाज हूँ में ,
गौर से जानो तो , दिल का सच्चा हमराज़ हूँ मैं ;
ना किसी बोली , ना कोई कीमत ,
ना समय , ना किसी तिजोरी का गुलाम हूँ मैं ;
लग जाऊं तो तीर ,
मिट जाऊं तो प्यार ,
रुक जाऊं तो होशियार ,
सहम जाऊं तो वफादार ;
बनते बिगड़ते हर रिश्ते का नकाब हूँ मैं,
इतराते हुए सर का ताज हूँ मैं ;
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