ज़िंदगी की पुस्तका में एक नया पना जुड़ रहा है ,
सुन्हेरे खाबों को सजाने का नवीन अफसर बन रहा है ;
गुज़रे बरस की ठोकरों से हँस कर निकल आने का इनाम मिल रहा है ,
आज फिर से सभी को खिलखिलाने का मौका सज रहा है ;
जीते जीते तो कई बरस बीत गए ,
आते वर्ष ज़िंदगी को खुल के जी जाने का संदेसा बंध रहा है ;
इकीसवीं सदी के अद्भुद रंगों वाकिफ होने का समा बन रहा है ,
आने वाले सुनहरे पलों के स्वागत में हर गुल खिल रहा है ;
एक नया गुलिस्तां बन रहा है ,
एक हसीं गुलिस्तां बन रहा है ;
नव वर्ष की शुभ कामनायें ||
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