आज फिर दिल में जगी एक छोटी सी आशा,
एक अनजाने मकसद को पूरा करने की अभिलाषा ||
धुँधली तस्वीरें हैं मगर सामने कुछ नहीं,
आँखें मूंद कर जो दिखता है वह खुली आँखों से नहीं ||
मंज़िल की तो खबर है, पर डगर का न कोई ठिकाना,
पता नहीं यह आज की कहानी है या सदियों का फ़साना ||
शायद एक नये सपने की तलाश में आज फिर दिन ढल गया,
और कल के उस सपने को पूरा करने का वक्त़ भी निकल गया ||
अब तो जाग मुसाफिर एक सदी और गुज़र गयी,
बंद आँखों से देखे हुए सपनों की तो मंज़िल भी भटक गयी ||
आज फिर ... आज फिर ...
यह कहानी किसी पुस्तिका मैं छपेगी,
और कल शायद इसकी एक परछाईं भी बनेगी ||
परन्तु यही है इस दौर के हर लेखक का निशाना,
हर जागते हुए इन्सान को बस एक बार है और जगाना ||
An aggregation of thoughts and ideas for anyone who appreciates wild but sensible read.
Friday, February 19
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लफ्ज़ की लफ्ज़ से गुफ्तगू इतराते हुए सर का ताज हूँ मैं, बनते हुए रिश्तों की बुनियाद हूँ मैं। ... जाने कितने ही ज़ख्मों का इलाज हूँ में , गौर...
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What is my latest style to deal with a problem: Kill or Conclude 😉
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जवाब नहीं इस लेखन का.
ReplyDeleteसिर्फ एक सबद में कहा जाये तो - "जबरदस्त"
वाह! मान गए "दीपिका"
Behtareen..
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