Friday, February 19

आज फिर ...

आज फिर दिल में जगी एक छोटी सी आशा,


एक अनजाने मकसद को पूरा करने की अभिलाषा ||


धुँधली तस्वीरें हैं मगर सामने कुछ नहीं,


आँखें मूंद कर जो दिखता है वह खुली आँखों से नहीं ||


मंज़िल की तो खबर है, पर डगर का न कोई ठिकाना,


पता नहीं यह आज की कहानी है या सदियों का फ़साना ||


शायद एक नये सपने की तलाश में आज फिर दिन ढल गया,

और कल के उस सपने को पूरा करने का वक्त़ भी निकल गया ||
अब तो जाग मुसाफिर एक सदी और गुज़र गयी,


बंद आँखों से देखे हुए सपनों की तो मंज़िल भी भटक गयी ||




आज फिर ... आज फिर ...


यह कहानी किसी पुस्तिका मैं छपेगी,


और कल शायद इसकी एक परछाईं भी बनेगी ||

परन्तु यही है इस दौर के हर लेखक का निशाना,

हर जागते हुए इन्सान को बस एक बार है और जगाना ||






2 comments:

  1. जवाब नहीं इस लेखन का.
    सिर्फ एक सबद में कहा जाये तो - "जबरदस्त"
    वाह! मान गए "दीपिका"

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