Sunday, December 11

सपना या सच्चाई

सपना या फिर सच्चाई ??


धुंदली सी शाम और खिड़की पर बैठी एक परछाई,

कुछ सोचती थी की ख्यालों की बौछार सी आई,

एक याद फिर उन होंठों पर मुस्कान ले आई,

सोचते वह - क्या यह सपना है या कोई सचाई |

ना जाने कौन ले आया उन यादों की परछाई …

अनजानी ही सही, एक कहानी से आज फिर आँख भर आई,

सोचते हम, ना तो यह सपना है ना ही कोई सचाई ||


ख्यालों का समां यूं ही बेकरार था - २,

आगे देखिये मौसम का क्या हाल था ....


गम के पलों पर मानो पतझड़ सा छा गया - (२),

और मुस्कुराहटों का समां सभी ओर लहरा गया,

काश!! ऐसी ही होती हर एक पल की कारवाही; - (२)

सोचते हम, ना तो यह सपना है ना ही कोई सचाई |

सोचते हम ना तो यह सपना है, और ना ही कोई सचाई ||



एक दसतक; दवार की एक दसतक, हकीक़त का एहसास ले आई,

पलक जपकते ही सामने थी वक़्त की सच्चाई,

ना ही बदला था कल - (२), और वैसी ही तो बज रही है घडी की शहनाई,

ना जाने फिर कौन सी ख़ुशी उन होंटों पर मुस्कान थी ले आई,

ना जाने कौन सी ख़ुशी उन होंटों पर मुस्कान ले आई ....

सोचते हम ना तो यह सपना है ना ही कोई सचाई ||

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